रामदास जी ने अपने पुराने माकन को तुड़वा कर नया माकन बनवाया !जब तक माकन बना उनके परिवार प्रत्येक सदस्य कारीगरों के पास बारी-बारी से बैठा रहता !कहीं कोई कमी रहती तो कारीगरों को तुरंत टोका जाता ! खैर किसी तरह मकान बन कर तैयार हो गया !रंग -रोगन भी हो गया ! सुबह देखा तो उनके मकान की बाहरी दीवार पर भयानक शक्ल वाला बडा सा राक्षस का मुखोटा लगा था !उस की शक्ल इसी थी कि राह चलते प्रत्येक व्यकित कि निगाहें उस पर पडती थी !एक दिन बातों-बातों में इस का राज एवम लाभ पूछा तो उन्होंने ने बडे संतोषजनक भाव से बताया कि इससे घर को बुरी नज़र नहीं लगती है !उनकी इस बात पर मुझे हँसी आ गयी !मुझे हँसता देख उन्होंने बुरा सा मुंह बनाया और कहा कि आप को पता नहीं है इस लिए हंस रहें हो !मैनें इसका कारण पूछा तो वे इतना ही जवाब दे पाए कि सब लगाते हैं !
हम अनेक प्रचलित बातों , परम्पराओं का कारण जाने बिना मानते रहते हैं जबकि हो सकता है वे उचित न हों !इसी प्रकार राक्षस का मुखोटा लगाना किसी भी प्रकार उचित नहीं मन जा सकता है !यह ठीक उसी प्रकार है जैसे कोई लुटेरे को घर दी सुरक्षा सोंप दे ! राक्षस तामसिक तत्व है !इससे नकारात्मक उर्जा उत्पन्न होती है !धीरे-धीरे यह नकारात्मक उर्जा संचित हो कर घर का वातावरण बिगड़ देती है ! घर में कलह ,तनाव का वातावरण बन जाता है !जिस घर को बुरी नज़र से बचाना चाहते थे उसी में आशान्ति छा जाती है ! जिस प्रकार समान पेशे से जुड़े लोगों में तुरंत मित्रता हो जाती है उसी प्रकार नकारात्मक उर्जा भी नकारात्मक उर्जा से तुरंत मिल जाती है ! वायुमंडल में व्याप्त राक्षसी उर्जा अपने सम्बन्धी को देख वहाँ नहीं रुकेगी इस बात कि क्या गारंटी है ! बजाए इस के कि राक्षस का मुखोटा लगाया जाए हमारे शुभ मांगलिक प्रतीक चिन्ह का प्रयोग करना ज्यादा प्रशस्त होगा ! स्वस्तिक ,ॐ देवी ,त्रिशूल या गणेश जी जो अमृत कि वर्षा करते हैं को भवन के बाहर लगाया जा सकता है ! जब रावण की लंका की रक्षा, लंकिनी नामक राक्षसी [जो कि वहाँ कि पहरेदार थी ] ही नहीं कर सकी जिसे मुखोटे का प्रतीक मान सकतें हैं तो हमारे घर कि रक्षा ये राक्षस के मुखोटे क्या कर सकेंगे !