प्रिय मित्रो
पिछले कुछ दिनों से विकृत मानसिकता वाले एवम पशु समाज का प्रतिनिधित्व करने वालो की इमेल प्राप्त हो रहीं है! यह हमारी संस्क्रती पर कुठाराघात के साथ विचार आदान प्रदान के इस माध्यम का दुरूपयोग भी है !आप सबसे अनुरोध है कि इस प्रकार की मानसिकता वाले लोगों का बहिष्कार करें तथा भगवान से कामना करें कि इनको भी सदबुद्दी देकर mnushyata का कुछ ansh प्रदान करें जिससे ये भी सभ्य समाज का hissa bnne की कोशिश kr सकें !
ज्योतिष आपको अपनी क्षमताओ का ज्ञान कराकर उचित दिशा में उचित कार्य करने को प्रेरित करती है .ज्योतिष की मदद से अपनी मेहनत का पूरा फल लिया जा सकता है.
Monday, December 8, 2008
Saturday, May 31, 2008
जन्मकुंडली एक पर भविष्य अलग-अलग क्यों ?
ज्योतिषियों के सामने प्राय: ऐसा प्रश्न बार-बार आता है की एक ही शहर में एक ही समय पैदा हुए बालकों का भविष्य प्राय: अलग -अलग क्यों होता है !उनका भविष्य एक ही होना चाहिऐ क्योंकि उनकी जन्मकुंडली एक जैसी बनती है और ग्रह का प्रभाव भी एक जैसा है तो यह अंतर क्यों ? ऐसी जिज्ञासा होना स्वाभाविक भी है !ऐसा होना भी चाहिए परन्तु नही होता है क्यों ? मेरा ऐसा मानना है की किसी भी व्यकित के भविष्य निर्धारण में निम्न तथ्यविशेष भूमिका निभाते हैं ..............
१ पूर्व जन्म के कर्म --हमारी संस्क्र्ती पुनर्जन्म को मानती है !हम ऐसा मानते हैं की व्यक्ति जन्म लेता है और आयु पूर्ण होने पर मर जाता है वह पुन: जन्म लेता है और फिर मर जाता है ! प्रकर्ति में यह नियम चलता रहता है !उस व्यक्ति द्वारा किए गएशुभाशुभ कर्मों का फल उस व्यक्ति को भोगना पड़ता है और इसी के अनुसार वह सुख -दुख का अनुभव करता है !यदि व्यक्ति की आयु लम्बी है तो वह इसी जन्म में यह पा लेता है और कभी-कभी अगले जन्म में पाता है !इसी कारणऐसा देखा जाता है किएक ही माता -पिता से जन्म लेने वाले दो भाइयों के लालन -पालन में भी अंतर होता है !पहले बालक के जन्म समय माता -पिता अभावों में रहते हैं और दुसरे बालक के जन्म समय तक वे सम्पन्न हो जाते हैं ,क्यों ? इस जन्म में पहले बालक ने तो क्या बुरा किया और दुसरे बालक ने क्या अच्छा किया जो यह अंतर हुआ ? जरुर कोई कारण है जिसने यह अंतर किया ! में समझता हूँ कि यह पूर्व जन्म के कर्मों का ही फल है !
२ गर्भ समय माता के विचार -आचरण का प्रभाव -किसी भी व्यक्ति के भविष्य निर्धारण में जब वह माता के गर्भ मेंथा ,उस समय माता के आचार -विचार का उस पर बहुत प्रभाव पड़ता है !माता क्या सोचती है ,किस वातावरण में रहती है इन सब बातों का बालक पर प्रभाव पड़ता है !अभिमन्यु का चक्र वेधन माता के गर्भ में सीखना इस बात का प्रमुख उदाहरण है !इसी प्रकार जब हम परिवार के रोते बालक को गोद में लेते हैं तो वह चुप हो जाता है जबकि दूसरा लेता है तो वह रोता रहता है !क्योंकि वह बालक जब गर्भ में था उस समय से वह हमारी आवाज सुन रहा है और अपने को परिचित में मानता है !
३ जन्म समय ग्रह प्रभाव - बालक जब जन्म लेता है कोई ग्रह किस अवस्था में है इस बात का भी उस पर प्रभाव पड़ता है !ग्रह के उच्च ,नीच अस्त आदि का बालक पर प्रभाव पड़ता है !अपनी अवस्था के अनुसार ही ग्रह बालक को अपने तत्वों से लाभ देता है या वंचित कर देता है !इन ग्रह प्रभावों से ही बालक का आचरण ,स्वभाव ,कार्यशैली बनती है !
४ vaastu प्रभाव उक्त बातों के अलावा बालक पर समाज ,वातावरण एवम भोगोलिक प्रभाव भी पड़ता है ! इसे ही वास्तु प्रभाव कहते हैं !उच्च परिवार का संस्कारवान बालक के ख़राब वातावरण में रहने पर उसके बिगड़ jane के avasr bn jate हैं !
१ पूर्व जन्म के कर्म --हमारी संस्क्र्ती पुनर्जन्म को मानती है !हम ऐसा मानते हैं की व्यक्ति जन्म लेता है और आयु पूर्ण होने पर मर जाता है वह पुन: जन्म लेता है और फिर मर जाता है ! प्रकर्ति में यह नियम चलता रहता है !उस व्यक्ति द्वारा किए गएशुभाशुभ कर्मों का फल उस व्यक्ति को भोगना पड़ता है और इसी के अनुसार वह सुख -दुख का अनुभव करता है !यदि व्यक्ति की आयु लम्बी है तो वह इसी जन्म में यह पा लेता है और कभी-कभी अगले जन्म में पाता है !इसी कारणऐसा देखा जाता है किएक ही माता -पिता से जन्म लेने वाले दो भाइयों के लालन -पालन में भी अंतर होता है !पहले बालक के जन्म समय माता -पिता अभावों में रहते हैं और दुसरे बालक के जन्म समय तक वे सम्पन्न हो जाते हैं ,क्यों ? इस जन्म में पहले बालक ने तो क्या बुरा किया और दुसरे बालक ने क्या अच्छा किया जो यह अंतर हुआ ? जरुर कोई कारण है जिसने यह अंतर किया ! में समझता हूँ कि यह पूर्व जन्म के कर्मों का ही फल है !
२ गर्भ समय माता के विचार -आचरण का प्रभाव -किसी भी व्यक्ति के भविष्य निर्धारण में जब वह माता के गर्भ मेंथा ,उस समय माता के आचार -विचार का उस पर बहुत प्रभाव पड़ता है !माता क्या सोचती है ,किस वातावरण में रहती है इन सब बातों का बालक पर प्रभाव पड़ता है !अभिमन्यु का चक्र वेधन माता के गर्भ में सीखना इस बात का प्रमुख उदाहरण है !इसी प्रकार जब हम परिवार के रोते बालक को गोद में लेते हैं तो वह चुप हो जाता है जबकि दूसरा लेता है तो वह रोता रहता है !क्योंकि वह बालक जब गर्भ में था उस समय से वह हमारी आवाज सुन रहा है और अपने को परिचित में मानता है !
३ जन्म समय ग्रह प्रभाव - बालक जब जन्म लेता है कोई ग्रह किस अवस्था में है इस बात का भी उस पर प्रभाव पड़ता है !ग्रह के उच्च ,नीच अस्त आदि का बालक पर प्रभाव पड़ता है !अपनी अवस्था के अनुसार ही ग्रह बालक को अपने तत्वों से लाभ देता है या वंचित कर देता है !इन ग्रह प्रभावों से ही बालक का आचरण ,स्वभाव ,कार्यशैली बनती है !
४ vaastu प्रभाव उक्त बातों के अलावा बालक पर समाज ,वातावरण एवम भोगोलिक प्रभाव भी पड़ता है ! इसे ही वास्तु प्रभाव कहते हैं !उच्च परिवार का संस्कारवान बालक के ख़राब वातावरण में रहने पर उसके बिगड़ jane के avasr bn jate हैं !
Tuesday, May 27, 2008
राक्षस का मुखौटा
रामदास जी ने अपने पुराने माकन को तुड़वा कर नया माकन बनवाया !जब तक माकन बना उनके परिवार प्रत्येक सदस्य कारीगरों के पास बारी-बारी से बैठा रहता !कहीं कोई कमी रहती तो कारीगरों को तुरंत टोका जाता ! खैर किसी तरह मकान बन कर तैयार हो गया !रंग -रोगन भी हो गया ! सुबह देखा तो उनके मकान की बाहरी दीवार पर भयानक शक्ल वाला बडा सा राक्षस का मुखोटा लगा था !उस की शक्ल इसी थी कि राह चलते प्रत्येक व्यकित कि निगाहें उस पर पडती थी !एक दिन बातों-बातों में इस का राज एवम लाभ पूछा तो उन्होंने ने बडे संतोषजनक भाव से बताया कि इससे घर को बुरी नज़र नहीं लगती है !उनकी इस बात पर मुझे हँसी आ गयी !मुझे हँसता देख उन्होंने बुरा सा मुंह बनाया और कहा कि आप को पता नहीं है इस लिए हंस रहें हो !मैनें इसका कारण पूछा तो वे इतना ही जवाब दे पाए कि सब लगाते हैं !
हम अनेक प्रचलित बातों , परम्पराओं का कारण जाने बिना मानते रहते हैं जबकि हो सकता है वे उचित न हों !इसी प्रकार राक्षस का मुखोटा लगाना किसी भी प्रकार उचित नहीं मन जा सकता है !यह ठीक उसी प्रकार है जैसे कोई लुटेरे को घर दी सुरक्षा सोंप दे ! राक्षस तामसिक तत्व है !इससे नकारात्मक उर्जा उत्पन्न होती है !धीरे-धीरे यह नकारात्मक उर्जा संचित हो कर घर का वातावरण बिगड़ देती है ! घर में कलह ,तनाव का वातावरण बन जाता है !जिस घर को बुरी नज़र से बचाना चाहते थे उसी में आशान्ति छा जाती है ! जिस प्रकार समान पेशे से जुड़े लोगों में तुरंत मित्रता हो जाती है उसी प्रकार नकारात्मक उर्जा भी नकारात्मक उर्जा से तुरंत मिल जाती है ! वायुमंडल में व्याप्त राक्षसी उर्जा अपने सम्बन्धी को देख वहाँ नहीं रुकेगी इस बात कि क्या गारंटी है ! बजाए इस के कि राक्षस का मुखोटा लगाया जाए हमारे शुभ मांगलिक प्रतीक चिन्ह का प्रयोग करना ज्यादा प्रशस्त होगा ! स्वस्तिक ,ॐ देवी ,त्रिशूल या गणेश जी जो अमृत कि वर्षा करते हैं को भवन के बाहर लगाया जा सकता है ! जब रावण की लंका की रक्षा, लंकिनी नामक राक्षसी [जो कि वहाँ कि पहरेदार थी ] ही नहीं कर सकी जिसे मुखोटे का प्रतीक मान सकतें हैं तो हमारे घर कि रक्षा ये राक्षस के मुखोटे क्या कर सकेंगे !
हम अनेक प्रचलित बातों , परम्पराओं का कारण जाने बिना मानते रहते हैं जबकि हो सकता है वे उचित न हों !इसी प्रकार राक्षस का मुखोटा लगाना किसी भी प्रकार उचित नहीं मन जा सकता है !यह ठीक उसी प्रकार है जैसे कोई लुटेरे को घर दी सुरक्षा सोंप दे ! राक्षस तामसिक तत्व है !इससे नकारात्मक उर्जा उत्पन्न होती है !धीरे-धीरे यह नकारात्मक उर्जा संचित हो कर घर का वातावरण बिगड़ देती है ! घर में कलह ,तनाव का वातावरण बन जाता है !जिस घर को बुरी नज़र से बचाना चाहते थे उसी में आशान्ति छा जाती है ! जिस प्रकार समान पेशे से जुड़े लोगों में तुरंत मित्रता हो जाती है उसी प्रकार नकारात्मक उर्जा भी नकारात्मक उर्जा से तुरंत मिल जाती है ! वायुमंडल में व्याप्त राक्षसी उर्जा अपने सम्बन्धी को देख वहाँ नहीं रुकेगी इस बात कि क्या गारंटी है ! बजाए इस के कि राक्षस का मुखोटा लगाया जाए हमारे शुभ मांगलिक प्रतीक चिन्ह का प्रयोग करना ज्यादा प्रशस्त होगा ! स्वस्तिक ,ॐ देवी ,त्रिशूल या गणेश जी जो अमृत कि वर्षा करते हैं को भवन के बाहर लगाया जा सकता है ! जब रावण की लंका की रक्षा, लंकिनी नामक राक्षसी [जो कि वहाँ कि पहरेदार थी ] ही नहीं कर सकी जिसे मुखोटे का प्रतीक मान सकतें हैं तो हमारे घर कि रक्षा ये राक्षस के मुखोटे क्या कर सकेंगे !
Monday, May 26, 2008
भाग्य बदलें
समय से पहले और भाग्य से ज्यादा कभी नहीं मिलता , अक्सर लोगों की ऐसी धारणा है पर शायद उन्हें यह पता नहीं है कि भाग्य है क्या ?मेरे विचार से" भाग्य अपने द्वारा किए गए कर्म एवम पुरुषार्थ का प्रतिफल है !कर्म के बिना भाग्य कि कल्पना नहीं कि जा सकती है ! हमारी संस्क्र्ती पुनर्जन्म को मानती है और किए गए कर्मों का फल इस जन्म में या अगले जन्म में भोगना पड़ता है !जिस प्रकार किसी गेंद को किसी दीवार पर फ़ेंक कर मारा जाए तो वह फेंकने वाले के पास वापस आती है उसी प्रकार व्यकित द्वारा किए गए कर्म का प्रतिफल भी उसे वापस प्राप्त होता है !यदि वह व्यकित वहाँ उपस्तिथ रहता है तो उसे वह फल तुरंत उसी जन्म में मिल जाता है और यदि उसकी आयु पूर्ण हो गयी हो तो वह फल संचित हो जाता है और उस समय तक सुप्त रहता है जब तक वह व्यकित पुन जन्म नही ले लेता !जैसे ही वह जन्म लेता है उसके द्वारा किए गए शुभाशुभ कर्म के अनुसार फल मिलना शुरू हो जाता है! यदि ऐसा नहीं होता तो एक ही माता-पिता से जन्म लेने वाले भाई -बहिनों का भाग्य अलग-अलग नहीं होता !ऐसा प्राय देखा जाता है कि पहले बच्चे के जन्म के समय माता-पिता का आर्थिक पक्ष कमजोर होता है और वह बालक अभावों में पलता है जबकि उसी परिवार में जब दूसरा बालक पैदा होता है तो उसे सर्व सुविधा मिल जाती है !क्यों ? पहले बालक ने तो इस जन्म में क्या बुरा किया और दुसरे बालक ने क्या अच्छा किया जो उनको ऐसा अंतर देखने को मिला!यह अवश्य उनके पूर्व जन्म के किए गए कर्मों का फल था जो इस जन्म में भाग्य बन कर मिला !भाग्य एवम कर्म एक प्रकार से दो कदम हैं जिनमें भाग्य का कदम आगे निकल जाता है तो फल तुरंत प्राप्त हो जाता है और कर्म का कदम आगे निकल जाता है और भाग्य का पीछे रह जाता है तो भरपूर मेहनत के बाद भी प्राप्ति नहीं पाती है ! कर्म ही जीवन है ! हम अपने भाग्य के निर्माता खुद हो कर" समय से पहले एवम भाग्य से ज्यादा नहीं मिलता कि उकित को नकार सकते है !भाग्यवादी न होकर कर्मावादी बने एवम भविष्य अपनी मुट्ठी में कर लें !
Saturday, May 24, 2008
ज्योतिष की बुराई
ज्योतिष की बुराई करना हम हिन्दुस्तानियो से सीखा जा सकता है !कुछ लोग अपने को ज्यादा पढ़ा लिखा मन कर अपनी संस्कृति को पिछड़ा एवम दकियानूसी मान कर उसकी खिल्ली उड़ना अपनी शान समझते है !आधुनिकता एवम पाश्चात्य प्रभाव के चलते अपने को भारतीय कहलाना भी उनको शर्मसार लगता है!बड़ी-बड़ी चर्चा आयोजित की जाती है,विज्ञान दी दुहाई दी जाती है!ज्योतिष विज्ञान है या नही इस पर तर्क-वितर्क किया जाता है!चर्चा मे चार-पांच वैज्ञानिक जिन्होंने कभी ज्योतिष नही पढा एक ऐसे व्यक्ति से जो शायद ख़ुद भी पूरी तरह ज्योतिष नही जानता है से तर्क-वितर्क करते हैं !उसे तरह -तरह के बचकाने, बिना आधार के सवाल मे उलझा कर अपनी विद्य्वता साबित कर शास्त्रों को मिथ्या साबित कर दिया जाता है!ये चार -पांच उन लोगों की गुटबाजी है जिन्होंने कभी खुली बहस का आयोजन नही किया ,विषय के जानकारों को आमंत्रित नही किया ,जिस के बारें मे वे ख़ुद नही जानते ,कभी पढा नहीं और अपनी विद्व्यता दिखा कर उस शस्त्र को कपोल -कल्पित साबित करने का प्रयास करते हैं जिसका लोहा आज पूरी दुनिया मान चुकी है और मान रही है शास्त्र वर्णित ज्ञान को विदेशों में अपना कर उसका पेटेंट करवाया जा रहा है ! ये लोग जाहिर रूप में ज्योतिष दी बुराई करते हैं और निजी जीवन में समस्या आने पर सबसे पहले ख़ुद ही ज्योतिष के पास भागते हैं !हम भारतीय हैं और हमारी दरोहरों को समझे उन के गूढ़ रहस्यों को जाने और दैनिक जीवन में प्रयोग कर परिणाम के आधार पर ही कोई निर्णय लें केवल दो-चार अति आधुनिक,भारत में जन्म लेकर अपने को शर्मसार मानने वालें के आधार पर नहीं ! जय भारत
Tuesday, May 6, 2008
Friday, May 2, 2008
ज्योतिष
ज्योतिष न केवल भविष्य जानने की विधा है अपितु यह व्यक्ति की क्षमता और रूचि का अधययन कर उसे उचित दिशा में कार्य करने को प्रेरित करती है .ज्योतिष की मदद से अपनी मेहनत का पूरा फल लिया जा सकता है.
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